पित्त की थैली की पथरी की आयुर्वेदिक चिकित्सा ( ayurvedic treatment for gallbladder )-
पित्त की थैली हमारे पाचन तंत्र का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा है ये हमारे उदर भाग में यकृत (liver) के नीचे पाया जाता है इसका आकर गाजर के समान होता है लीवर यानि कि यकृत में बनने वाला पित्त पित्त की थैली में संरक्षित (store)रहता है जब भोजन आमाशय में पाचन के लिये आता है तब पित्ताशय से पित्त रस निकलकर भोजन में मिल जाता है और भोजन के एसिडिक फॉर्म को बदल कर क्षारीय बना देता है |


पथरी बनने के कारण -
पित्त की थैली में पथरी बनने का कारण पित्त का न निकलना या कम निकलना होता है यकृत में एक बार में 24 घंटे के लिये काम आने वाला पित्त रस निकल आता है और वो पित्ताशय में store हो जाता है समय समय पर ये पित्त रस निकल कर भोजन के पाचन में help करता है और उसे लसीला बना देता है |
आयुर्वेद के अनुसार यदि हमारा पित्त कुपित हो जाये तो पित्ताशय से निकलने वाला पित्त कम हो जाता है और पित्ताशय में संगृहीत पित्त घिरे - घिरे गाढ़ा होने लगता है और stone यानि पथरी में बदल जाता है |
 
लक्षण -
पित्ताशय में पथरी बनने से पहले ही हमारा शरीर इसके लक्षण प्रकट करने लगता है यदि सही समय पर आप इन्हें समझ ले तो ये पहले दौर में ही ख़त्म को सकती है -
मल का दूषित होना, खट्टी - खट्टी डकार आना, मल का साफ़ न होना, खट्टी उलटिया आना, पेट में दर्द सुजन, चक्कर आना, कोलस्ट्रोल का बढना इत्यादि इसके होने और होने से पहले के मुख्या लक्षण होते है  |

उपाय (treatment)-

पित्त की थैली की पथरी होने पर निम्नलिखित उपायों का इस्तेमाल करके आँपरेशन से बचा जा सकता है |
* रोज सुबह खाली एक गिलास पानी में पांच नीबू का रस मिलाकर पीना चाहिये |
*गुडहल के फुल को सुखाकर उसका चूर्ण बना ले और उस चूर्ण को रोज सुबह शाम एक - एक चम्मच ठन्डे पानी के साथ ले |
*अस्वगंघा का चूर्ण और आंवला चूर्ण दोनों को मिलाकर सुबह शाम ठन्डे पानी के साथ सेवन करे |
*सेव का मुरब्बा और आंवला का मुरब्बा नियमित रूप से लें |
* भोजन में गरिष्ठ भोजन जंक फ़ूड ना ले |
* बेजड के आटे की रोटी का सेवन करे |
* तली भुनी चीजे न ले तथा भोजन के 1 घंटा 45 मिनट तक पानी न पिये तथा दिन में कम से कम 10 से 12 लीटर पानी अवश्य पिये |


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